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पेरिस में एफ़िल टॉवर पर हुई घटना के बाद, स्वामीनारायण संप्रदाय और बोचासनवासी अक्षरपुरुषोत्तम संस्था (बीएपीएस) वैश्विक स्तर पर चर्चा का विषय बन गए हैं.
पेरिस में जो कुछ हुआ, उसके कारण उस संप्रदाय पर 'महिलाओं के ख़िलाफ़ भेदभाव' के आरोप लगे और विरोध प्रदर्शन हुए.
हालांकि, स्वामीनारायण संप्रदाय के अनुयायियों द्वारा महिलाओं के साथ किए जाने वाले व्यवहार को लेकर वर्षों से विवाद रहा है.
प्रख्यात पत्रकार और मानवाधिकार कार्यकर्ता सलिल त्रिपाठी ने गुजरातियों पर लिखी अपनी पुस्तक में यहाँ तक लिखा है, "स्वामीनारायण संप्रदाय की सीमाएँ ही गुजरात की सीमाएँ हैं. उन्होंने अपनी सीमाएँ स्वयं निर्धारित कर ली हैं. इस संप्रदाय में महिलाओं पर लगाए गए अत्यंत कठोर प्रतिबंध उन सीमाओं को लागू करने का एक और तरीक़ा है."
हालांकि, स्वामीनारायण संप्रदाय पर आरोप है कि उनका न केवल महिलाओं के ख़िलाफ़, बल्कि दलितों के ख़िलाफ़ भी भेदभाव का एक इतिहास रहा है.
एक मामले में, स्वामीनारायण संप्रदाय के प्रतिनिधियों ने देश के सर्वोच्च न्यायालय में यह साबित करने की कोशिश की कि वे हिन्दू धर्म से संबंध नहीं रखते हैं.
इस मामले में भी, दलितों का मंदिरों में प्रवेश और उनके साथ होने वाला भेदभाव ही कारण था.
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यह एक ऐसे मामले के बारे में है जो 20 साल तक चला और जिसमें स्वामीनारायण संप्रदाय और हिन्दू धर्म के बारे में अदालत में कई चर्चाएँ हुईं.
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नवंबर 1947 में, बॉम्बे हरिजन टेम्पल एंट्री एक्ट, 1947, भारत में लागू हुआ था.
इस क़ानून ने दलितों को भारत के सभी हिन्दू मंदिरों में प्रवेश करने और पूजा करने का अधिकार दिया. उस समय, भारत में दलितों के लिए मंदिरों में प्रवेश करना आसान नहीं था और उनके साथ व्यापक भेदभाव होता था.
अब हुआ यूं कि 1947 के अंत में, महागुजरात दलित संघ के अध्यक्ष मूलदास भूदरदास वैश्य ने घोषणा की कि वो अहमदाबाद के स्वामीनारायण मंदिर (नर नारायणदेव मंदिर) में प्रवेश करेंगे.
इस घोषणा के बाद शास्त्री यज्ञपुरुषदास ने स्वामीनारायण संप्रदाय की अहमदाबाद पीठ के ट्रस्टियों और सत्संगियों की ओर से अहमदाबाद सिविल कोर्ट में केस दायर किया.
यहां इस बात पर ज़रूर ध्यान देना चाहिए कि इस गद्दी का हाल ही में विवादों में घिरे संगठन बीएपीएस से कोई सीधा संबंध नहीं है.
मुक़दमा दायर करने वाले शास्त्री यज्ञपुरुषदास, बीएपीएस के संस्थापक शास्त्री यज्ञपुरुषदास (शास्त्रीजी महाराज) नहीं हैं. ये दोनों शख़्स अलग-अलग हैं.
यज्ञपुरुषदास ने अदालत में यह तर्क दिया, "स्वामीनारायण संप्रदाय के मंदिर 'हिन्दू मंदिरों' की परिभाषा के अंतर्गत नहीं आते हैं, इसलिए ग़ैर-सत्संगी (दलित) उनके मंदिरों में प्रवेश नहीं कर सकते हैं."
सितंबर 1951 में अहमदाबाद की सिविल अदालत ने इस मुद्दे पर अपना फ़ैसला सुनाया.
स्वामीनारायण संप्रदाय ने अहमदाबाद की दीवानी अदालत में जीत हासिल की और इसके कारण दलित समुदाय के लोग तब स्वामीनारायण मंदिर में प्रवेश नहीं कर पाए.
लेकिन यहां यह ध्यान देने वाली बात है कि अहमदाबाद की अदालत ने यह नहीं माना था कि स्वामीनारायण संप्रदाय हिन्दू धर्म से अलग है.
बाद में मूलदास वैश्य और तत्कालीन बॉम्बे राज्य ने बॉम्बे हाई कोर्ट में अपील की.
यहां तक कि हाई कोर्ट में भी, स्वामीनारायण संप्रदाय के अनुयायी यह तर्क देते रहे कि वे हिन्दू धर्म से संबंधित नहीं हैं.
हाई कोर्ट में संप्रदाय द्वारा प्रस्तुत तर्कों का आधार:
इन चार आधार पर स्वामीनारायण संप्रदाय ने अदालत में यह साबित करने की कोशिश की कि वे हिन्दू धर्म से अलग हैं और इसलिए मंदिरों में दलितों के प्रवेश संबंधी क़ानून उन पर लागू नहीं होता है.
बॉम्बे हिन्दू प्लेसेज़ ऑफ़ वर्शिप एक्ट (एंट्री ऑथोराइज़ेशन) एक्ट, 1956, उस समय पारित किया गया था जब यह मामला हाई कोर्ट में लंबित था.
1958 में, हाई कोर्ट ने उनके तर्कों को ख़ारिज कर दिया और फ़ैसला सुनाया कि स्वामीनारायण संप्रदाय हिन्दू धर्म और समुदाय का हिस्सा है.
फिर मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचता है. यहां मामला और भी दिलचस्प हो जाता है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट की बेंच को भी इस सवाल का जवाब ढूंढना होता है कि आख़िर 'हिन्दू' की परिभाषा क्या है?
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सुप्रीम कोर्ट में मुख्य न्यायाधीश पी.बी. गजेंद्रगडकर सहित पांच न्यायाधीशों की पीठ के समक्ष दलीलें पेश की गईं.
इन बहसों का मुख्य प्रश्न यह था कि क्या स्वामीनारायण संप्रदाय हिन्दू धर्म से अलग है या नहीं. क्या इसके मंदिर 1956 के प्लेसेज़ ऑफ़ वर्शिप एक्ट (उपासना स्थल अधिनियम) के अंतर्गत आते हैं या नहीं.
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में 14 जनवरी, 1966 को अपना अंतिम फैसला सुनाया और इस दावे को खारिज कर दिया कि स्वामीनारायण संप्रदाय हिन्दू धर्म से अलग है.
लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रश्न का उत्तर देने के लिए अपने फैसले में हिन्दू धर्म का विस्तार से वर्णन किया.
अदालत ने स्वीकार किया कि हिन्दू धर्म की विशिष्ट विशेषताओं को साबित करना इस मुद्दे को और अधिक जटिल बना देता है क्योंकि यह धर्म 4,000 वर्षों में विकसित हुआ है.
सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फैसले में कहा, "विश्व के अन्य धर्मों के विपरीत, हिन्दू धर्म किसी एक ईश्वर की स्थापना का दावा नहीं करता और न ही किसी एक ईश्वर की पूजा करता है. यह धर्म किसी एक सिद्धांत या एक मान्यता तक सीमित नहीं है और न ही किसी एक दार्शनिक अवधारणा में विश्वास रखता है."
"वह किसी एक प्रकार के धार्मिक अनुष्ठानों या रीति-रिवाजों का पालन नहीं करता है. वास्तव में, वह किसी भी धर्म या संप्रदाय की पारंपरिक और संकीर्ण विशेषताओं को पूरा करता हुआ प्रतीत नहीं होता है. इसे व्यापक अर्थों में केवल 'जीवन जीने की शैली' (अ वे ऑफ़ लाइफ़) माना जा सकता है."
अपने फैसले में, अदालत ने एनसाइक्लोपीडिया ऑफ़ रिलीजन एंड एथिक्स और मोनर विलियम्स की किताब 'रिलीजियस थॉट्स एंड लाइफ़ इन इंडिया' और डॉ. राधाकृष्णन की पुस्तक 'द हिन्दू व्यू ऑफ़ लाइफ़' का भी हवाला दिया है और उन पर विस्तार से चर्चा की है.
सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि हिन्दू धर्म में ऐसे लोग भी हैं जो किसी भी प्रकार की मूर्ति पूजा में विश्वास नहीं करते. इसके अलावा, हिन्दू धर्म में अनगिनत देवी-देवता हैं और उनकी पूजा हिंदुओं के ही विभिन्न समूह करते रहते हैं.
सुप्रीम कोर्ट ने स्वामीनारायण के जीवन, उनके ग्रंथ 'शिक्षापत्री' और स्वामीनारायण संप्रदाय के अन्य ग्रंथों पर भी चर्चा की.
इसके बाद सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने फैसले में लिखा, "यह कहना पूरी तरह गलत है कि स्वामीनारायण संप्रदाय के अनुयायी हिन्दू समुदाय से अलग एक विशिष्ट समुदाय बनाते हैं और उनका धर्म हिन्दू धर्म से भिन्न है."
"स्वामीनारायण एक हिन्दू संत थे जो वल्लभाचार्य के उपदेशकों और अनुयायियों के बीच प्रचलित भ्रष्ट प्रथाओं को समाप्त करने और हिन्दू धर्म को उसकी मूल महिमा और पवित्रता में पुनर्स्थापित करने के लिए दृढ़ संकल्पित थे."
सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फैसले के आख़िर में ये कहा, "अंत में, हम इस बात पर जोर देना चाहते हैं कि कानून द्वारा दलितों को मंदिरों में प्रवेश करने का जो अधिकार दिया गया है, वह दलितों के सभी सामाजिक सुख-सुविधाओं और अधिकारों का प्रतीक है."
"यह हमेशा याद रखना चाहिए कि सामाजिक न्याय भारत के संविधान में निहित लोकतांत्रिक जीवन शैली का मूल आधार है. इसलिए, यह याचिका खारिज की जाती है."
गुजरात में भी स्वामीनारायण संप्रदाय और दलितों के खिलाफ भेदभाव के कई मामले सामने आते रहे हैं.
80 के दशक में, स्वामीनारायण संप्रदाय के कुछ साहित्य में दावा किया गया था कि इस संप्रदाय ने गुजरात के निचले वर्गों की स्थिति में सुधार किया था, और यहां तक कि ब्रिटिश और मराठा भी इसके अनुयायी बन गए थे.
इसके जवाब में, गुजराती इतिहासकार मकरंद मेहता ने वर्ष 1986 में स्वामीनारायण संप्रदाय पर एक लेख प्रकाशित किया. यह लेख सूरत के सेंटर फ़ॉर सोशल स्टडीज़ की 'अर्थात' पत्रिका में प्रकाशित हुआ था.
इसमें उन्होंने स्वामीनारायण संप्रदाय के इन दावों की जांच की और अधिकांश दावों का खंडन किया।
इसके बाद स्वामीनारायण संप्रदाय ने सरकार से मकरंद मेहता और 'अर्थात' के दो संपादकों घनश्याम शाह और अच्युत याग्निक के खिलाफ आईपीसी की धारा 295-ए के तहत आपराधिक जांच करने की मांग की.
मकरंद मेहता ने अपने लेखों में दावा किया कि सहजानंद, यानी स्वामीनारायण ने दलितों की स्थिति में सुधार के लिए कुछ भी विशेष नहीं किया.
जब यह मामला चल रहा था, तब स्वामीनारायण संप्रदाय ने मकरंद मेहता के आरोपों का जवाब दिया. यह जवाब दलितों के प्रति संप्रदाय के दृष्टिकोण की एक झलक प्रस्तुत करता है.
इस संप्रदाय का दावा था, "स्वामी सहजानंद द्वारा दिए गए आश्रय से दलित समुदाय ने सफ़ाई बनाए रखना सीख लिया है और उनका व्यवहार ब्राह्मणों जैसा हो गया है. उस समय प्रचलित जाति व्यवस्था के संदर्भ में, सहजानंद ने उन्हें ऊपर उठाने का काम किया है."
"जहां दलित समुदाय की संख्या अधिक थी, वहां सहजानंद ने उनके लिए अलग मंदिर भी बनवाए. जाति व्यवस्था के उस दौर में सहजानंद ने उनकी मुक्ति के लिए हर संभव प्रयास किया. उन्होंने दलितों को साक्षरता प्रदान की और उसकी वजह से दलितों ने धार्मिक पुस्तकें पढ़ना शुरू किया."
1966 में फ़ैसला सुनाए जाने के बाद से 60 साल बीत चुके हैं. लेकिन स्वामीनारायण संप्रदाय द्वारा दलितों के खिलाफ भेदभाव के आरोप अभी भी कायम हैं.
न्यूयॉर्क टाइम्स की 2021 की एक रिपोर्ट के अनुसार, स्थानीय अधिकारियों ने न्यू जर्सी के बीएपीएस स्वामीनारायण मंदिर पर छापा मारा था. मंदिर पर कई कथित "निम्न जाति" के लोगों को जबरन मज़दूर के रूप में काम पर रखने का आरोप था.
अदालत में आरोप लगाया गया कि उन्हें महीने में केवल 450 डॉलर का भुगतान किया जाता था. अमेरिका के कई स्वामीनारायण मंदिरों में भी यही स्थिति बताई गई.
हालांकि, बीएपीएस के एक प्रतिनिधि ने कम भुगतान के आरोपों का खंडन किया.
इस मामले में आपराधिक जांच पूरी हो चुकी है और दीवानी मुक़दमा अभी भी जारी है. अभी तक ये आरोप साबित नहीं हुए हैं.
फ्रांस 24 की एक रिपोर्ट में बीएपीएस के एक मंदिर में काम करने वाले एक पूर्व कर्मचारी की कहानी भी दर्ज की गई है. उन्होंने अब मंदिर का काम छोड़ दिया है, लेकिन उन्हें अभी तक न्याय नहीं मिला है. वे भी दलित समुदाय से हैं और मंदिर के निर्माण में पत्थर तराशने का काम करने के लिए उन्हें भारत से ले जाया गया था.
उन्होंने आरोप लगाया कि उनका पासपोर्ट ज़ब्त कर लिया गया था और मंदिर परिसर एक केंद्रीय जेल की तरह था, जहां उन्हें किसी से बात करने की अनुमति नहीं थी, बाहर जाने की अनुमति नहीं थी और उन्हें केवल पत्थर तराशने का काम करना पड़ता था.
हालांकि, इस मामले की सुनवाई के दौरान भी, बीएपीएस संगठन इन आरोपों से इनकार करता रहा है.
बीएपीएस ने अतीत में यह स्पष्ट कर दिया है कि उसका संगठन जाति और जन्म के आधार पर होने वाले भेदभाव का विरोध करता है.
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