सुप्रीम कोर्ट ने रिटायरमेंट के बाद CPF (Contributory Provident Fund) से GPF (General Provident Fund)-cum-Pension Scheme में जाने की मांग करने वाले एक रिटायर्ड प्रोफेसर को राहत देने से इनकार कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि कर्मचारी ने नियमितीकरण के समय तय शर्तों को स्वीकार किया था और CPF योजना के तहत मिलने वाले रिटायरमेंट लाभ भी प्राप्त कर लिए थे। ऐसे में रिटायर होने के बाद उन शर्तों को चुनौती देकर दूसरी पेंशन व्यवस्था का लाभ मांगना उचित नहीं है। यह फैसला उन कर्मचारियों के लिए महत्वपूर्ण है, जो अलग-अलग भविष्य निधि या पेंशन योजनाओं के तहत काम कर रहे हैं। कोर्ट के फैसले से यह संकेत मिलता है कि नौकरी के दौरान किसी सेवा शर्त को स्वीकार करने के बाद उसे लंबे समय बाद, खासकर रिटायरमेंट के बाद चुनौती देना आसान नहीं होता। आइए जरा विस्तार से इसकी डिटेल्स जानते हैं।
मामला नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ रूरल डेवलपमेंट (NIRD) के पूर्व प्रोफेसर के. सुमन चंद्र से जुड़ा है। उन्होंने नवंबर 1984 में NIRD में कॉन्ट्रैक्चुअल रिसर्च एसोसिएट के रूप में नौकरी शुरू की थी और उस समय वह CPF योजना के तहत आते थे। वर्ष 1985 में उनकी सेवाएं नियमित की गईं। इसके बाद उन्होंने संस्थान में अलग-अलग पदों पर काम किया और आगे चलकर प्रोफेसर बने। 4 मई 2012 के एक आदेश के जरिए उनकी प्रोफेसर के तौर पर सेवाओं को नियमित किया गया। इस आदेश में साफ तौर पर कहा गया था कि नियमितीकरण आदेश जारी होने की तारीख से प्रभावी होगा और उनकी सेवा मौजूदा CPF योजना के तहत ही जारी रहेगी।
चंद्र 31 जनवरी 2017 को रिटायर हुए। रिटायरमेंट के बाद उन्हें CPF से जुड़े लाभ मिले, जिसमें NIRD की ओर से उनके CPF खाते में किए गए योगदान के साथ उनका खुद का योगदान भी शामिल था। लेकिन, रिटायर होने के बाद उन्होंने CPF व्यवस्था पर सवाल उठाया और GPF-कम-पेंशन योजना में शामिल करने की मांग की। उनका तर्क था कि CPF के तहत रखना NIRD के नियमों और सेवा उपनियमों के अनुरूप नहीं था। मामला पहले केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण यानी CAT के सामने गया। जुलाई 2019 में CAT ने चंद्र के पक्ष में फैसला देते हुए NIRD को उन्हें पात्रता की तारीख से GPF योजना में शामिल करने का निर्देश दिया।
हालांकि, बाद में इस मामले की दिशा बदल गई। इसी तरह के एक मामले में NIRD के कर्मचारी श्याम सुंदर प्रसाद शर्मा को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने फरवरी 2023 में फैसला दिया था। कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि नियमितीकरण 4 मई 2012 के आदेश की तारीख से प्रभावी माना जाएगा, न कि कर्मचारी की शुरुआती नियुक्ति की तारीख से। कोर्ट ने यह भी ध्यान दिया था कि नियमितीकरण आदेश में दी गई शर्तों को कर्मचारी ने उस समय चुनौती नहीं दी थी। तेलंगाना हाईकोर्ट ने इसी फैसले को चंद्र के मामले में लागू करते हुए CAT के आदेश को रद्द कर दिया। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
जस्टिस उज्जल भुइयां और जस्टिस अतुल एस. चांदुरकर की पीठ ने कहा कि चंद्र का मामला शर्मा के मामले से काफी हद तक समान है। कोर्ट ने विशेष रूप से 4 मई 2012 के नियमितीकरण आदेश का हवाला दिया, जिसमें CPF योजना जारी रखने की शर्त स्पष्ट थी। चंद्र ने उस समय इस शर्त को चुनौती नहीं दी और बाद में CPF के तहत मिलने वाले रिटायरमेंट लाभ भी स्वीकार किए। सुप्रीम कोर्ट ने माना कि ऐसी स्थिति में रिटायरमेंट के बाद उसी व्यवस्था को चुनौती देकर GPF और पेंशन लाभ मांगना सफल नहीं हो सकता। इसलिए कोर्ट ने तेलंगाना हाई कोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए उनकी याचिका खारिज कर दी।
इस फैसले का सबसे बड़ा संदेश यह है कि कर्मचारियों को नियमितीकरण आदेश, पेंशन व्यवस्था और भविष्य निधि से जुड़ी शर्तों को ध्यान से समझकर ही स्वीकार करना चाहिए। यदि किसी कर्मचारी को किसी सेवा शर्त या रिटायरमेंट स्कीम पर आपत्ति है, तो उसे उचित समय पर चुनौती देना जरूरी हो सकता है। वर्षों तक शर्त स्वीकार करने और उसके तहत लाभ लेने के बाद रिटायरमेंट के समय योजना बदलने की मांग करने पर कानूनी अड़चनें पैदा हो सकती हैं। हालांकि हर कर्मचारी का मामला उसके नियुक्ति आदेश, सेवा नियमों और संबंधित तथ्यों पर निर्भर करता है, इसलिए ऐसे विवाद में विशेषज्ञ कानूनी सलाह लेना बेहतर रहता है।
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