इमेज स्रोत, Vipin KUmar/Hindustan Times via Getty Images
नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करने के प्रयास के दौरान हिरासत में लिए गए 'कॉकरोच जनता पार्टी' (सीजेपी) के आशुतोष रांका और सौरव दास की न्यायिक हिरासत दो दिन के लिए और बढ़ा दी गई थी.
स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट (एसईएम) रितु राज की अदालत ने 19 अक्तूबर को यह आदेश दिया था.
अदालत ने हिरासत बढ़ाने के पीछे मुख्य रूप से दो कारण बताए. पहला, अतीत का आचरण, क़ानून के प्रति अनादर और शांति भंग होने की गंभीर आशंका. दूसरा, उनकी तरफ़ से पेश किए गए ज़मानतियों का अयोग्य पाया जाना.
रांका और दास के वकीलों ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी को बताया कि एसईएम कोर्ट के इस आदेश को दिल्ली हाई कोर्ट में चुनौती दी गई है. सीजेपी की लीगल हेड रत्ना सिंह ने 'एक्स' पर पोस्ट कर कहा है कि वे मामले में जल्द सुनवाई की मांग करेंगे.
सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दीपके को शनिवार को एसईएम अदालत से रिहाई मिल गई थी. दीपके को 16 अक्तूबर को कनॉट प्लेस में 'लहरा दो तिरंगा' विरोध प्रदर्शन से ठीक पहले वहाँ से हिरासत में लिया गया था, जहाँ वो ठहरे थे.
इमेज स्रोत, Sonu Mehta/Hindustan Times via Getty Images
दरअसल इस पूरे मामले की शुरुआत 10 अक्तूबर को हुई थी. दिल्ली पुलिस के मुताबिक़, सीजेपी नेताओं ने विरोध प्रदर्शन के लिए बिना पुलिस अनुमति के सोशल मीडिया के ज़रिए प्रदर्शन का आह्वान किया था.
पुलिस का तर्क था कि जंतर-मंतर पर प्रदर्शन से क़ानून-व्यवस्था की स्थिति बिगड़ सकती है. इस आधार पर पुलिस ने दीपके, रांका और दास को 10 अक्तूबर को दिल्ली एयरपोर्ट से हिरासत में ले लिया था.
अगले दिन, 11 अक्तूबर को उन्हें एसईएम अदालत में पेश किया गया. अदालत में तीनों ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 136 के तहत 50,000 रुपये के निजी मुचलके और ज़मानती बॉन्ड पर एक साल तक शांति बनाए रखने का वादा दिया, जिसके आधार पर उन्हें रिहा कर दिया गया था.
क़ानूनी भाषा में इसे 'पीस बॉन्ड' कहा जाता है. यह एक ऐसा लिखित वादा होता है, जिसमें व्यक्ति यह सहमति देता है कि वह एक तय समय तक किसी इलाक़े में शांति बनाए रखेगा और कोई ऐसा काम नहीं करेगा जिससे क़ानून-व्यवस्था बिगड़े.
इमेज स्रोत, Raj K Raj/Hindustan Times via Getty Images
पुलिस का दावा है कि रिहा होने के तुरंत बाद इन नेताओं ने फिर से जंतर-मंतर पर प्रदर्शन का आह्वान शुरू कर दिया.
मामले के शिकायतकर्ता सब-इंस्पेक्टर (एसआई) मोहित भाटी ने एसईएम अदालत को बताया कि 13 अक्तूबर की सुबह आशुतोष रांका और सौरव दास जेडीयू कार्यालय के परिसर के अंदर से कूदकर जंतर-मंतर पहुंच गए और वहां नारेबाज़ी कर हंगामा करने लगे.
14 अक्तूबर को एसईएम महेश कुमार मीना द्वारा पारित पहले रिमांड आदेश में पुलिस और अदालत ने बेहद सख़्त टिप्पणियां कीं.
आदेश में कहा गया कि रांका और दास "अड़ियल और आक्रामक" हैं और उनमें "कोई पछतावा नहीं दिख रहा है".
आदेश में यह भी कहा गया कि दोनों अभियुक्तों का पिछला आचरण दिखाता है कि वे "अधिकारियों के वैध निर्देशों का उल्लंघन करते हैं" और आम जनता को अवैध विरोध प्रदर्शन में शामिल होने के लिए उकसाने पर अड़े हुए हैं.
इन टिप्पणियों और शांति भंग होने की आशंका के आधार पर अदालत ने बीएनएसएस की धारा 130 के तहत नोटिस जारी करते हुए उन्हें पांच दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया.
इमेज स्रोत, Pradeep Gaur/SOPA Images/LightRocket via Getty Images
देश - दुनिया की बड़ी ख़बरें जिन्होंने बटोरी सुर्खियां.
19 अक्तूबर को जब उन्हें दोबारा पेश किया गया, तो एसईएम रितु राज की अदालत ने उनकी हिरासत दो दिन और बढ़ा दी. अपने आदेश में अदालत ने कहा कि दोनों ने "जानबूझकर बॉन्ड का उल्लंघन किया है और शांति भंग की है".
अदालत ने सख़्त टिप्पणी करते हुए कहा कि अभियुक्तों के व्यवहार से पता चलता है कि "उनके मन में क़ानून के प्रति कोई सम्मान नहीं है."
अदालत ने यह भी कहा कि प्रतिबंध हटाए जा चुके इलाक़ों में प्रदर्शन का आह्वान करके दोनों ने बार-बार ऐसा करने की प्रवृत्ति दिखाई है. अदालत का मानना था कि उनके पिछले कृत्यों को देखते हुए उनके शांति बनाए रखने के आश्वासन पर भरोसा नहीं किया जा सकता.
इसके अलावा, जांच अधिकारी ने अदालत को बताया कि उन्हें एक ''अज्ञात व्हाट्सएप मैसेज" मिला है, जिससे पता चलता है कि जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन करने का ख़तरा अब भी बना हुआ है.
हिरासत बढ़ाने का एक और बड़ा कारण बचाव पक्ष द्वारा पेश किए गए नए ज़मानतियों का ख़ारिज होना था.
आदेश में स्पष्ट किया गया है कि एक ज़मानती के बॉन्ड और आधार कार्ड की तस्वीरों में स्पष्ट बेमेल था. एक अन्य ज़मानती दास के माता-पिता का नाम और पता जैसी "बुनियादी जानकारी देने में भी विफल रहीं". अदालत ने कहा कि इन ज़मानतियों का अभियुक्तों पर कोई नियंत्रण नहीं है.
इमेज स्रोत, Arun SANKAR / AFP via Getty Images
सुप्रीम कोर्ट के वकील निपुण सक्सेना इस पूरी क़ानूनी प्रक्रिया को बीएनएसएस के अध्याय 9 के तहत निवारक यानी प्रिवेंटिव शक्तियों का हिस्सा बताते हैं.
उन्होंने बीबीसी से कहा, "बीएनएसएस की धारा 126 से 143 तक एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट को यह अधिकार है कि वह सार्वजनिक शांति भंग होने की आशंका पर किसी व्यक्ति से बॉन्ड भरवा सकता है. जब कोई व्यक्ति इस पीस बॉन्ड का उल्लंघन करता है, तो मजिस्ट्रेट धारा 130 के तहत जांच शुरू करता है."
ज़मानतियों के ख़ारिज होने के मुद्दे पर उन्होंने कहा है कि बीएनएसएस की धारा 140 मजिस्ट्रेट को यह जांचने का अधिकार देती है कि ज़मानती योग्य है या नहीं.
सक्सेना के मुताबिक, "ज़मानती वह व्यक्ति होता है जो अभियुक्त को पेश करने के लिए ज़िम्मेदार होता है. अगर ज़मानती अभियुक्त की बुनियादी जानकारी नहीं दे पाता, तो मजिस्ट्रेट उसे ख़ारिज कर सकता है."
सक्सेना ने यह भी स्पष्ट किया कि सैद्धांतिक रूप से इन निवारक धाराओं के तहत किसी व्यक्ति को अधिकतम छह महीने तक हिरासत में रखा जा सकता है.
हालांकि, वह सुप्रीम कोर्ट के पुराने फ़ैसलों का हवाला देते हुए कहा कि केवल ज़मानती न दे पाने को लंबे समय तक हिरासत में रखने का आधार नहीं बनाया जाना चाहिए.
इमेज स्रोत, Raj K Raj/Hindustan Times via Getty Images
सीजेपी नेताओं के वकील अभिष्ट हेला ने इस पूरी क़ानूनी प्रक्रिया में हितों के टकराव का मुद्दा उठाया है.
हेला ने कहा, " पुलिस अधिकारी ही शिकायतकर्ता हैं. वे ही [रांका और दास को] हिरासत में ले रहे हैं और फिर उन्हें एसईएम अदालत के सामने पेश कर रहे हैं, जो ख़ुद एक एसीपी रैंक का पुलिस अधिकारी होता है."
पीस बॉन्ड के उल्लंघन के पुलिस के दावे पर हेला ने क़ानूनी तर्क दिया, "अपने मौलिक अधिकारों का प्रयोग करना पीस बॉन्ड का उल्लंघन नहीं है. पीस बॉन्ड का उल्लंघन तब माना जाता है, जब सार्वजनिक शांति को खतरा हो, लेकिन वहां कोई आम जनता मौजूद ही नहीं थी."
एक ही संगठन से जुड़े होने के बावजूद दीपके को रिहाई मिलने और दास-रांका की हिरासत जारी रहने पर सक्सेना ने कहा कि बीएनएसएस के तहत मजिस्ट्रेट के पास यह विशेषाधिकार होता है कि वह व्यक्ति से निजी मुचलका भरवाए या जमानती की मांग करे.
उनके अनुसार संभवतः दीपके से एक नया निजी मुचलका भरवाकर उन्हें रिहा कर दिया गया, जबकि दास और रांका के मामले में अदालत ज़मानतियों की मांग कर रही है.
हेला क़ानूनी प्रक्रिया में अपनाए जा रहे दोहरे मापदंड की ओर इशारा करते हुए बोले कि दीपके के मामले में ज़मानतियों का उस तरह से सत्यापन नहीं किया गया, जबकि दास और रांका के मामले में पेश किए गए आठ ज़मानतियों से कड़ी पूछ-ताछ करके उन्हें ख़ारिज कर दिया गया.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
BBC World Service के नए ऐप को डाउनलोड करें
BBC News हिन्दी को चुनें और पाइए न्यूज़ अलर्ट, लाइव टीवी, पॉडकास्ट... सब एक जगह
कृपया नोट करें: नया ऐप ब्रिटेन और अमेरिका में उपलब्ध नहीं है.
प्लेबैक आपके उपकरण पर नहीं हो पा रहा
शॉर्ट वीडियो का अंत
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित
© 2026 BBC. बाहरी साइटों की सामग्री के लिए बीबीसी ज़िम्मेदार नहीं है. बाहरी साइटों का लिंक देने की हमारी नीति के बारे में पढ़ें.
Comments ()
Be the first to share your perspective on this story!