अजित पवार के निधन के बाद राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के भीतर सत्ता‑संतुलन का संघर्ष तेज हो गया है। पार्थ पवार का संगठन में बढ़ता प्रभाव और भविष्य की राजनीतिक समीकरणों को लेकर अंदरूनी फूट तेज हो गई है, जिससे दिल्ली के राजनैतिक गलियारों तक चर्चा पहुँच गई है।
हाल ही में अमित शाह के साथ हुई हाई‑प्रोफ़ाइल बैठक में प्रफुल्ल पटेल, छगन भुजबल, सुनील तटकरे, दिलीप वलसे पाटिल, हसन मुश्रीफ़, धनंजय मुंडे और समीर भुजबल शामिल रहे। इस प्रतिनिधिमंडल में पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष सुनेत्रा पवार और सांसद पार्थ पवार की अनुपस्थिति ने एनसीपी के अंदरूनी असंतोष को स्पष्ट रूप से उजागर किया।
विचारधारा के पीछे केवल पार्थ पवार के बढ़ते प्रभाव ही नहीं, बल्कि महाराष्ट्र सरकार में वित्त मंत्रालय की वापसी की मांग और दोनों एनसीपी गुटों के संभावित विलय की अटकलें भी प्रमुख कारण मानी जा रही हैं। नई कार्यशैली से उत्पन्न बेचैनी ने महायुति गठबंधन और एनसीपी के भविष्य को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
स्रोतों के अनुसार, नए नेतृत्व के तहत किए जा रहे नियुक्तियों और फैसलों से पार्टी के वरिष्ठ पदाधिकारी नाखुश हैं। वे इस बात से भी नाराज़ हैं कि सुनेत्रा पवार और पार्थ पवार सीधे बीजेपी के केंद्रीय नेतृत्व से संवाद कर रहे हैं, जबकि अन्य वरिष्ठ नेताओं को दरकिनार किया जा रहा है। चुनाव आयोग को भेजे गए एक पत्र और प्रफुल्ल पटेल‑सुनील तटकरे की भूमिका को लेकर भी दूरी बढ़ी है।
20 अक्टूबर को भी सुनेत्रा पवार और पार्थ पवार ने अमित शाह से मुलाकात की थी, जिसमें प्रफुल्ल पटेल, सुनील तटकरे और छगन भुजबल जैसे दिग्गज नेता शामिल नहीं थे। इस बैठक के बाद एनसीपी के वरिष्ठ नेताओं के बीच असंतोष की लहर तेज़ हो गई।
अब एनसीपी के दिग्गज नेताओं की अमित शाह से सीधे मुलाकात को अपने अधिकारों और चिंताओं को दर्ज कराने का माध्यम माना जा रहा है, परन्तु उन्होंने इस मुलाकात के बारे में स्पष्ट बयान नहीं दिया है।
एनसीपी में लंबे समय से चल रही आंतरिक कलह के साथ ही वित्त मंत्रालय की बहाली भी प्रमुख मांगों में से एक है। यह पोर्टफोलियो पहले अजित पवार के पास था; उनका जाना बाद में वरिष्ठ नेताओं ने इसे फिर से हासिल करने की मांग की। 25 अक्टूबर को मुंबई में देवगिरी में हुई कोर कमेटी बैठक में इस मुद्दे पर चर्चा हुई थी।
उसी बैठक के बाद छगन भुजबल ने कहा कि दो एनसीपी गुटों के विलय पर आधिकारिक बातचीत नहीं हुई है, पर वित्त मंत्रालय को फिर से हासिल करने पर सहमति बनी है। इस प्रकार वित्त मंत्रालय की मांग को अमित शाह के साथ हुई मुलाकात का प्रमुख कारण बताया जा रहा था।
एनसीपी के भीतर शक्ति का संतुलन स्पष्ट है: सुनेत्रा पवार के पास उपमुख्यमंत्री पद है, पार्थ पवार के पास विरासत का दावा और भविष्य की महत्वाकांक्षा है, जबकि प्रफुल्ल पटेल, तटकरे, छगन भुजबल और वलसे पाटिल जैसे नेताओं के पास दशकों का अनुभव और मजबूत संगठनात्मक आधार है। इसलिए दिल्ली की बैठक को केवल वित्त मंत्रालय की मांग मानना, वास्तविक उद्देश्यों को छुपा देता है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि अमित शाह एनसीपी के नेताओं से अलग‑अलग संवाद कर रहे हैं, तो यह केवल एक विभागीय सौदा नहीं हो सकता। बीजेपी को एकजुट सहयोगी चाहिए, परन्तु एकजुट एनसीपी का नेतृत्व किसके हाथ में होगा, यही इस पार्टी का बड़ा पेच है। सुनेत्रा पवार और पार्थ पवार की अनुपस्थिति पार्टी के भीतर एक बड़े प्रश्नचिह्न की तरह है।
हाल ही में हुए महाराष्ट्र विधान परिषद (MLC) चुनावों ने भी पार्टी के भीतर की राग को सार्वजनिक कर दिया। पुणे स्नातक सीट, जो traditionally एनसीपी की गढ़ रही थी, पार्टी ने नहीं लड़ी, जबकि कई वरिष्ठ नेता चुनाव लड़ने के लिए तैयार थे। परिणामस्वरूप पार्टी के वरिष्ठ नेता काफी नाराज़ हैं।
शरद पवार की एनसीपी ने पुणे और बारामती सीटें जीतीं, जबकि कांग्रेस ने नागपुर MLC सीट पर जीत दर्ज की। एनसीपी के दिग्गजों का मानना है कि यह रणनीति शरद पवार को पार्टी को वाक‑ओवर देने के इरादे से की गई थी, जिससे बीजेपी पुणे सीट हार गई।
सियासी गलियारों में शरद पवार की एनसीपी और अजित पवार‑नित एनसीपी के विलय की अटकलें भी जोरों पर हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बारामती दौरे के आसपास इस विलय की संभावना जताई जा रही है, जिससे दिग्गज नेताओं में बेचैनी बढ़ गई है, क्योंकि उन्हें डर है कि विलय के बाद पवार परिवार का दबदबा बढ़ेगा और उनका वर्चस्व घटेगा।
एक वरिष्ठ नेता के अनुसार, किसी भी संभावित विलय के लिए बीजेपी के केंद्रीय नेतृत्व की मंजूरी आवश्यक होगी। यदि दो गुटों का विलय हो जाता है, तो यह न केवल NDA की स्थिति को मजबूत करेगा, बल्कि महाराष्ट्र सरकार में एनसीपी को फिर से वित्त मंत्रालय मिलने का रास्ता भी साफ कर सकता है।
एनसीपी में दो समानांतर धारा बन रही हैं: एक पवार परिवार की विरासत और नई नेतृत्व की, और दूसरी उन वरिष्ठ नेताओं की, जिन्होंने अजित पवार के साथ पार्टी की शक्ति, संगठन और नेटवर्क संभाला है। अब सवाल सिर्फ अध्यक्ष कौन होगा नहीं, बल्कि पार्टी को कौन चलाएगा, क्योंकि कई बड़े नेताओं ने पार्थ पवार को अभी अनुभवहीन माना है।
पार्टी के राष्ट्रीय मुख्य प्रवक्ता उमेश पाटिल ने इस बीच गुटबाजी की खबरों को खारिज किया। उन्होंने बताया कि अमित शाह के साथ हुई मुलाकात पूरी तरह से औपचारिक और पूर्व‑निर्धारित थी, और कुछ राजनीतिक ताकतें जानबूझकर पार्टी के भीतर अनबन की झूठी खबरें फैला रही हैं। उन्होंने कहा कि एनसीपी महायुति गठबंधन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है और सुनेत्रा पवार के नेतृत्व में एकजुट है।
हालाँकि प्रफुल्ल पटेल‑भुजबल गुट की दिल्ली दौड़ ने यह स्पष्ट कर दिया है कि अजित पवार के बिना एनसीपी के भीतर नई "पावर डायनेमिक्स" को संभालना आसान नहीं हो रहा है।
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