हिंदू धर्म के ग्रंथों में समय के चक्र को चार युगों में बाँटा गया है – सतयुग, त्रेतायुग, द्वापर युग और कलयुग। वर्तमान को कलयुग माना जाता है और इस युग में मानव जीवन तथा समाज में गहरा परिवर्तन आने की चेतावनी शिव पुराण में दी गई है।
शिव पुराण के अनुसार, कलयुग में लोग पुण्य कर्मों से दूर हो जाएँगे, सत्य बोलने से मुंह मोड़ लेंगे और दूसरों की निंदा में लिप्त रहेंगे। पराए धन को हड़पने की इच्छा बढ़ेगी, स्त्रियों के प्रति आसक्ति और हिंसा की प्रवृत्ति भी प्रबल होगी। मनुष्य अपने शरीर को ही आत्मा मानने लगेगा, सद्गुणों का अभाव और बुद्धि पशुवत हो जाएगी, तथा माता-पिता के प्रति द्वेष भी बढ़ेगा।
धर्म और ज्ञान का स्वरूप भी बदल जाएगा। ग्रंथ में ब्राह्मणों को लोभ के प्रभाव में आने, वेदों को बेचकर जीविका चलाने जैसी प्रवृत्तियों को बढ़ते हुए बताया गया है। विद्या का उद्देश्य ज्ञान प्राप्त करने से हटकर केवल धन कमाने तक सीमित हो जाएगा। परंपरागत धार्मिक कर्मकांड, संध्यावंदन आदि से दूरी बढ़ेगी और ब्रह्मज्ञान के प्रति लोगों की रुचि घटेगी।
क्षत्रियों में शौर्य और पराक्रम की कमी होगी। वे धर्म और कर्तव्य का त्याग करके अनुचित तरीकों से जीवनयापन करने लगेंगे, तथा गलत कार्यों को प्राथमिकता देंगे।
वैश्य वर्ग में धर्म और संस्कारों से दूरी बढ़ेगी। धन कमाने को प्रमुख उद्देश्य बना लिया जाएगा, व्यापार में नाप-तौल की बेईमानी, ठगी और छल-कपट की प्रवृत्ति प्रबल होगी। शूद्रों के बारे में भी यह बताया गया है कि वे अपने निर्धारित कर्मों को छोड़कर अन्य वर्गों के आचार-विचार अपनाने लगेंगे, जिससे सामाजिक कर्तव्यों से दूरी बढ़ेगी।
विद्वान भी विवाद में उलझेंगे। धर्म और कर्तव्य से दूर होकर, वे अपने ज्ञान का उपयोग सत्य की खोज के बजाय वाद-विवाद में अपनी श्रेष्ठता साबित करने के लिए करेंगे। स्वयं को ऊँचा और कुलीन समझकर सामाजिक मर्यादाओं की सीमाओं को तोड़ेंगे, जिससे वैवाहिक और सामाजिक संबंधों में असंगति उत्पन्न होगी।
शिव पुराण में कलयुग की स्त्रियों के संदर्भ में भी नकारात्मक लक्षण बताए गए हैं – सदाचार से दूर होना, पति का अपमान करना, सास-ससुर के प्रति द्वेष रखना, तथा पारिवारिक जिम्मेदारियों से विमुख होना।
आज के समाज में भी झूठ, लालच, छल, हिंसा, स्वार्थ और रिश्तों में बढ़ती दूरी जैसी प्रवृत्तियाँ दिखाई देती हैं, जिन्हें कुछ लोग कलयुग के लक्षण मानते हैं। परंतु प्राचीन ग्रंथों की भविष्यवाणियों और आधुनिक घटनाओं के बीच सीधा वैज्ञानिक संबंध स्थापित करना उचित नहीं है। ये चेतावनियाँ धार्मिक और सामाजिक संदर्भ में ही समझी जानी चाहिए।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, कलयुग की अवधि बहुत लंबी मानी गई है। इसलिए वर्तमान समय को कलयुग का शुरुआती चरण माना जाता है और इसके समाप्त होने में अभी भी लंबा समय बाकी है।
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