क्या घर में किरायेदार या किसी अन्य की दुर्घटनावश (एक्सीडेंटल) मौत के लिए कानूनन मकान मालिक को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है? इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक आदेश में कहा है कि किसी जगह का मालिक होने मात्र से मकान मालिक पर एक्सीडेंटल मौत के लिए आपराधिक ज़िम्मेदारी नहीं डाली जा सकती, जब तक कि अभियोजन पक्ष के सबूतों से मालिक की ओर से कोई कानूनी रूप से साबित होने वाली लापरवाही या चूक का पता न चले। यह टिप्पणी सौरभ श्रीवास्तव ने अवधेश सिंह की याचिका स्वीकार करते हुए की है।
एफआईआर के अनुसार मृतक आईआईटी परीक्षा की तैयारी के दौरान लगभग आठ महीनों से याची के घर में किरायेदार के तौर पर रह रहा था। नौ जनवरी 2025 को उसके पिता को बेटे की मौत की सूचना मिली तो वह घटनास्थल पर पहुंचे, जहां उन्हें बताया गया कि शव बाथरूम के अंदर संदिग्ध परिस्थितियों में मिला। एफआईआर में आरोप लगाया गया कि बाथरूम में गैस गीज़र लगा था और उससे कार्बन मोनोऑक्साइड गैस निकली होगी। यह भी आरोप लगाया गया कि बाथरूम में हवा आने-जाने का कोई खास इंतज़ाम (वेंटिलेशन) नहीं था और गैस अंदर लेने के कारण छात्र की मौत हो गई। जांच के बाद पुलिस ने मकान मालिक के खिलाफ़ बीएनएस की धारा 106 के तहत चार्जशीट दाखिल की, जिसके बाद मजिस्ट्रेट ने मामले का संज्ञान लिया।
कोर्ट के सामने मकान मालिक की ओर से तर्क दिया कि याची अवधेश सिंह की ओर से कोई घोर लापरवाही या असावधानीपूर्ण कार्य नहीं किया गया और अभियोजन पक्ष के सबूतों से अपराध में उसकी कोई विशिष्ट भागीदारी साबित नहीं होती। राज्य सरकार ने याचिका का विरोध करते हुए पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टर के बयान का हवाला दिया कि मौत कार्बन मोनोऑक्साइड गैस निकलने के कारण हुई। शुरुआत में हाईकोर्ट ने कहा कि याची की प्रॉपर्टी में मौत होने का मतलब यह नहीं है कि उस पर बीएनएस की धारा 106 के तहत आपराधिक ज़िम्मेदारी तय की जा सके। कोर्ट ने कहा कि एक युवा छात्र की मौत दुखद है लेकिन इस प्रावधान के तहत आपराधिक ज़िम्मेदारी तय करने के लिए सिर्फ़ याची की प्रॉपर्टी में मौत होना काफ़ी नहीं है। प्रथम दृष्टया ऐसे सबूत होने चाहिए, जिनसे पता चले कि आरोपी ने कोई लापरवाही या जल्दबाज़ी वाला काम किया, जिसका मौत से सीधा और करीबी संबंध हो।
कोर्ट ने पाया कि याची के प्रॉपर्टी का मालिक/मकान-मालिक होने के अलावा, उस पर घोर लापरवाही का कोई खास आरोप नहीं लगाया गया। ऐसा कोई सबूत नहीं था, जिससे पता चले कि गीज़र तय सुरक्षा मानकों का उल्लंघन करके लगाया गया, या याची को पता था कि वह खराब है या लीकेज या खराबी के बारे में उसे पहले कोई शिकायत की गई। ऐसा भी कोई सबूत नहीं था, जिससे पता चले कि किसी खराबी या खतरे के बारे में पता होने के बावजूद, मकान-मालिक ने जानबूझकर सुधार के उपाय नहीं किए।
कोर्ट ने यह भी पाया कि मृतक उस प्रॉपर्टी में लगभग आठ महीने से रह रहा था और उस दौरान गीज़र, बाथरूम में वेंटिलेशन या किसी अन्य खतरनाक स्थिति के बारे में मकान-मालिक को कोई शिकायत नहीं की गई। कोर्ट ने माना कि सिर्फ़ इसलिए आपराधिक लापरवाही का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि घटना याची के घर के बाथरूम में हुई। साथ ही कहा कि प्रॉपर्टी का मालिक होने मात्र से किसी दुर्घटना में हुई मौत के लिए आपराधिक ज़िम्मेदारी तय नहीं की जा सकती, जब तक कि अभियोजन पक्ष के सबूतों से मालिक की ओर से कानूनी रूप से मानी जाने वाली लापरवाही या काम न करने का पता न चले। यह मानते हुए कि प्रथम दृष्टया बीएनएस की धारा 106 के तहत अपराध के तत्व नहीं बनते हैं, कोर्ट ने कानपुर नगर की जुडिशियल मजिस्ट्रेट कोर्ट नंबर एक के सामने लंबित चार्जशीट, संज्ञान/सम्मन आदेश और पूरी आपराधिक कार्यवाही रद्द कर दी।
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