महिला‑उत्पीड़न की चर्चा अक्सर बड़े अपराधों के बाद शुरू होती है, लेकिन रोज़मर्रा की उन हरकतों को अक्सर नजरअंदाज़ किया जाता है। दिल्ली की सड़कों पर यह बात अब आम हो गई है—किसी को लगातार घूरना, अनजाने में पीछे‑पीछे आना या बिना किसी कारण के बात करने की कोशिश करना।
इन छोटी‑छोटी लेकिन लगातार होने वाली घटनाओं को समझने के लिए आज तक की चार महिला रिपोर्टर्स ने देर रात दिल्ली के विभिन्न हिस्सों में कदम रखा। उन्होंने भीड़भाड़ वाले बाजार, अस्पताल, कॉलेज, मंदिर और ऑफिस‑जोन को चुना, जहाँ रोज़मर्रा की ज़िन्दगी चलती है।
मूलचंद अस्पताल के पास – शाम 7:30 के करीब, जब ऑफिस से लोग लौट रहे थे, रिपोर्टर ऐश्वर्या पल्लिवाल को एक कार वाला “ड्रॉप कर दूँ?” पूछकर रोकता है। जब उसने मना किया, तो वह “कंपनी चाहिए?” फिर “अच्छा लड़का” कहकर दोबारा पूछता है। तीन बार ‘नहीं’ कहने के बाद भी वह कार को 50 मीटर आगे मोड़ लेता है, फिर फिर से रुक कर “पक्का?” पूछता है। इस तरह की बार‑बार की नज़रें और सवाल अक्सर अपराध की श्रेणी में नहीं आते, पर महिला के लिए असहजता बनाते हैं।
पश्चिमी दिल्ली – जेसिका गोयल ने पटेल नगर, कीर्ति नगर, राजौरी गार्डन, जनकपुरी और तिलक नगर में कई बार पुरुषों को बाइकों या कारों से रुकते, घूरते और कभी‑कभी सिगरेट पीते हुए महिला की ओर देखते देखा। राजौरी गार्डन के बस‑स्टॉप पर एक बाइक बिना कारण रुकी, जनकपुरी में एक कार जेसिका के पीछे कुछ दूरी तक चली, और तिलक नगर में एक व्यक्ति बहुत करीब आया, मानो उसे छूना चाहता हो। पुलिस नहीं आई, न ही कोई FIR दर्ज हुई, फिर भी ये छोटे‑छोटे व्यवहार महिला को लगातार असहज कर देते हैं।
भर्ती कॉलेज के पास अंधेरे कोनों में रोशनी कम थी, जहाँ एक व्यक्ति जेसिका के बहुत करीब तक आया और उसे छूने की कोशिश की, लेकिन कोई बड़ा हंगामा नहीं हुआ। फिर भी ऐसी झलकें महिला की सुरक्षा भावना को धूमिल कर देती हैं।
दक्षिण दिल्ली – लाजपत नगर और ईएमएस के आसपास कार्तिकी अरोड़ा ने एक घंटे के भीतर सात‑आठ गाड़ियों को रुकते देखा। कई बार ड्राइवर रुक कर “मिलेंगी?” जैसे सवाल पूछते, जबकि वह लिफ्ट नहीं मांग रही थी। कई बार वही गाड़ी दो‑तीन बार वापस आती, फिर से रुकती। ऐसी बार‑बार की पेशकशें और नज़रें महिला को हर मोड़ पर सतर्क बना देती हैं।
हौज खास विलेज – एंट्री गेट पर एक व्यक्ति लगातार बैठा महिलाओं को घूर रहा था। एक बाइक सवार ने अपना सिर 180° तक घुमा कर दो महिलाओं को देखा, और एक समूह में कई लोग एक‑दूसरे को इशारा करके महिला को घूरते रहे। यह दर्शाता है कि कभी‑कभी घूरना एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि समूह का मनोरंजन बन जाता है।
कनॉट प्लेस – राजधानी का सबसे व्यस्त और रोशन इलाका होने के बावजूद यहाँ भी कई बार पुरुषों की नज़रें, लगातार घूरना और असहज करने वाले व्यवहार देखे गए। यह छोटे‑छोटे अनुभव मिलकर महिला की मनोदशा पर बड़ा असर डालते हैं।
एक राहगीर, प्रेयांशी, ने कहा कि पुरुषों का इस तरह घूरना अब “सामान्य” हो गया है। वह बताती हैं कि एक बार ऑटो में दो शराबी पुरुषों ने लगातार “मैम, हमारे साथ चलो” कहा, जबकि वह पूरी तरह ढकी हुई थी। ऐसे अनुभवों से वह पूछती हैं कि क्या महिलाओं को अब खुद की सुरक्षा के लिए बंदूक लेनी पड़ेगी?
एक और महिला ने जारा रिक्षे का इंतजार करते समय एक अजनबी की लगातार नज़रें महसूस कीं। तीन साल दिल्ली में रहने के बाद वह कहती हैं कि अब ऐसी हरकतों के साथ जीना सीख गई हैं, लेकिन यह अनुभव महिलाओं को देर रात बाहर निकलने से रोकता है और उनके सामाजिक जीवन को सीमित करता है।
इंदु ने दिल्ली मेट्रो में एक बार किसी व्यक्ति द्वारा जानबूझकर छूने की कोशिश का सामना किया। वह कहती हैं कि यह “गलती से नहीं हुआ” और अब वह पार्क में दौड़ते समय भी पीछे मुड़कर देखती हैं कि कोई उनका पीछा तो नहीं कर रहा। एक ही घटना का असर महिला के सार्वजनिक स्थानों में आत्मविश्वास को काफी हद तक बदल देता है।
हाल ही में दिल्ली‑एनसीआर में हुए हाई‑प्रोफ़ाइल बलात्कारों के बाद सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया, पुलिस ने गश्त बढ़ाई और कुछ कॉलेजों में ITBP के जवान तैनात किए। लेकिन सवाल यही बना रहता है कि हम किसकी सुरक्षा कर रहे हैं – गेट की, सड़क की या उस महिला की, जो बिना डर के सार्वजनिक जगह पर अपना काम करना चाहती है? रोशनी, CCTV, तेज़ जांच और जवाबदेही जरूरी हैं, पर साथ ही समाज के रवैये में बदलाव लाना भी उतना ही आवश्यक है।
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