इमेज स्रोत, Getty Images
दिल्ली पुलिस मुख्यालय के बाहर सोमवार को हुए विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व करने वाली एसीपी मनस्वी वशिष्ठ को निलंबित कर दिया गया है.
निलंबन की बात दिल्ली पुलिस ने समाचार एजेंसी पीटीआई से बताई है.
यह कार्रवाई उस विरोध प्रदर्शन के बाद हुई है, जिसमें हाल ही में गांधी नगर ट्रांसफ़र किए जाने के बाद एसीपी वशिष्ठ समेत दिल्ली पुलिस के कई दर्जन अधिकारी सोमवार को पुलिस मुख्यालय के बाहर जुटे थे.
वे पूर्वी दिल्ली के शाहदरा में वकीलों के साथ हालिया टकराव को लेकर पुलिस कमिश्नर अनुराग कुमार से मुलाक़ात करना चाहते थे.
एसीपी वशिष्ठ और शाहदरा थाने के स्टेशन हाउस ऑफिसर (एसएचओ) अरुण कुमार का तबादला कर दिया गया था. यह तबादला वकील ललित बंसल पर हमले के मामले में हुआ था. पुलिस की कार्रवाई के ख़िलाफ़ शहर के वकीलों ने बेमियादी हड़ताल शुरू कर दी थी.
पिछले हफ़्ते हड़ताल पर गए वकीलों ने आरोप लगाया था कि एसीपी और एसएचओ ने उन वकीलों को धमकाया था, जो बंसल पर हमले के मामले में अभियुक्तों के ख़िलाफ़ कार्रवाई की मांग करने थाने पहुँचे थे.
सोमवार को प्रदर्शन का नेतृत्व करते हुए वशिष्ठ ने कहा कि उनकी मांग पुलिस कमिश्नर से मुलाक़ात करने की है.
वशिष्ठ ने सोमवार को 'भारत माता की जय' और 'पुलिस एकता ज़िंदाबाद' के नारों के बीच कहा, "हमारी मांगें स्पष्ट हैं. हमें पुलिस कमिश्नर साहब से मिलना है. ऐसे मामलों से निपटने के लिए एक मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) होनी चाहिए. अगर हमारे साथ ऐसा होता है, तो हम शहर के लोगों की सुरक्षा के लिए कैसे लड़ेंगे?"
जेन ज़ी और विपक्षी पार्टियों के विरोध प्रदर्शनों से लगभग हर दिन निपटने वाली और अक्सर उनके ख़िलाफ़ ज़्यादती के आरोपों का सामना करने वाली दिल्ली पुलिस सोमवार को ख़ुद विरोध प्रदर्शन की स्थिति में आ गई.
इमेज स्रोत, Getty Images
देश - दुनिया की बड़ी ख़बरें जिन्होंने बटोरी सुर्खियां.
सोमवार को क़रीब 100 पुलिसकर्मियों और महिला पुलिसकर्मियों के एक समूह ने पुलिस मुख्यालय के बाहर प्रदर्शन किया था. इसके बाद वे मुख्यालय के अंदर दाखिल हुए और वहाँ अभूतपूर्व तरीक़े से धरने पर बैठ गए.
इससे हैरान वरिष्ठ अधिकारियों ने उन्हें कहा कि वे 'प्रदर्शनकारियों जैसा व्यवहार न करें'. पुलिसकर्मी दो अधिकारियों के तबादले के ख़िलाफ़ प्रदर्शन कर रहे थे.
पुलिसकर्मियों की बातचीत का यह वीडियो क्लिप सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है. इस वीडियो रीपोस्ट करते हुए जाने-माने फैक्ट चेकर मोहम्मद ज़ुबैर ने एक्स पर लिखा है, ''उम्मीद है कि नेहा बोरा दिल्ली पुलिस के अधिकारियों के इस विरोध-प्रदर्शन का समर्थन करेंगी और इसमें शामिल होंगी.''
ज़ुबैर की इस पोस्ट के जवाब में नेहा बोरा ने लिखा है, ''मुझे हैरानी है कि अगर आप दिल्ली पुलिस के समर्थन में, दिल्ली पुलिस के ही ख़िलाफ़ प्रदर्शन करते हैं, और वह भी ऐसे इलाक़े में जहाँ दिल्ली पुलिस ने धारा 163 लागू कर रखी है, तो क्या आपको हिरासत में ले लिया जाएगा?"
दिल्ली पुलिस के एक पूर्व कमिश्नर ने कोलकाता से प्रकाशित होने वाले अंग्रेज़ी दैनिक 'द टेलीग्राफ' से कहा, "यह पहली बार है, जब हमने पुलिसकर्मियों को मुख्यालय के अंदर आकर परिसर में खुलेआम विरोध प्रदर्शन करते देखा है."
पुलिसकर्मियों के बीच इस नाटकीय टकराव पर कॉकक्रोच जनता पार्टी (सीजेपी) के नेताओं और विपक्षी नेताओं ने चुटकी ली.
तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा ने एक्स पर पोस्ट किया, "हैलो दिल्ली पुलिस, मैं बंगाल में हूँ, वरना आज पुलिस बनाम पुलिस के इस प्रदर्शन में शामिल हो जाती. कितना मज़ेदार!"
उन्होंने लिखा, "आज दिल्ली पुलिस के किस समूह को लाठियां पड़ रही हैं और खटारा बसों में भरकर दिल्ली कैंट के डिटेंशन कैंप ले जाया जा रहा है? बताइए, हम उनके लिए स्विगी से खाना भेज देंगे."
सीजेपी के सह-संयोजक सौरव दास ने पोस्ट किया, "क्या इन पुलिसकर्मियों को शांति भंग करने के आरोप में शांति बनाए रखने के बॉन्ड पर हस्ताक्षर करने के लिए मजबूर किया जाएगा?"
प्रदर्शनकारी, जिनमें ज़्यादातर उत्तर-पूर्वी ज़िले के पुलिसकर्मी थे, सुबह क़रीब आठ बजे पुलिस मुख्यालय के बाहर जुटने लगे थे. यह इलाक़ा संसद से महज दो किलोमीटर दूर है और यहाँ विरोध प्रदर्शन की अनुमति नहीं है.
प्रदर्शनकारियों के हाथों में तख्तियां थीं, जिन पर उत्तर-पूर्वी ज़िले के सहायक पुलिस आयुक्त (एसीपी) मनस्वी वशिष्ठ और शाहदरा थाने के एसएचओ इंस्पेक्टर अरुण कुमार के तबादले रद्द करने की मांग की गई थी.
मुख्यालय के गेट पर उनके अपने ही सहकर्मियों ने उन्हें रोक दिया. इस दौरान पुलिस मुख्यालय के आसपास सुरक्षा बढ़ा दी गई.
इमेज स्रोत, Getty Images
प्रदर्शन का नेतृत्व कर रहे एसीपी वशिष्ठ ने संकेत दिया कि कथित हिंसा के लिए वकील ज़िम्मेदार थे.
उन्होंने कहा, "अगर हम पुलिस थानों के अंदर ही सुरक्षित नहीं हैं, तो दूसरों की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित कर सकते हैं? अगर हमें इंसाफ़ नहीं मिलेगा, तो हम दूसरों को न्याय कैसे दिलाएंगे?" उनकी इस बात पर प्रदर्शन कर रहे सहकर्मियों ने तालियां बजाईं.
नई दिल्ली के पुलिस उपायुक्त सचिन शर्मा मौक़े पर पहुँचे. उन्होंने प्रदर्शनकारियों से अनुशासन बनाए रखने और "प्रदर्शनकारियों जैसा व्यवहार न करने" की अपील की. उन्होंने पुलिसकर्मियों से अंदर आकर बातचीत करने को कहा.
दोपहर करीब 1.30 बजे प्रदर्शनकारी इमारतों के अंदर दाखिल हुए और धरने पर बैठ गए. वे पुलिस एकता के समर्थन में नारे लगा रहे थे. वरिष्ठ अधिकारियों के आदेशों को उन्होंने अनसुना कर दिया, जिससे अधिकारी असहज स्थिति में आ गए.
टेलिग्राफ़ के मुताबिक पुलिस कमिश्नर अनुराग कुमार और सभी विशेष पुलिस आयुक्त भी मुख्यालय पहुँचे और प्रदर्शनकारियों को बातचीत के लिए बुलाया. 'संपर्क सभा' नाम से यह बैठक शाम करीब 5.30 बजे शुरू हुई.
बैठक के दौरान दूसरे ज़िलों के पुलिसकर्मी भी मुख्यालय पहुँचने लगे.
दोनों अधिकारियों के तबादले 28 अक्तूबर को किए गए थे. शाहदरा पुलिस थाने में 23 अक्तूबर को हुए टकराव के पाँच दिन बाद यह आदेश आया था. इस टकराव में कथित तौर पर एक वकील के सिर में चोट लगी थी.
वकीलों ने आरोप लगाया था कि एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने "भरी हुई रिवॉल्वर लहराई" और उन्हें "धमकाया". इसके बाद ज़िला अदालतों के वकील अनिश्चित कालीन हड़ताल पर चले गए थे. उन्होंने यह हड़ताल दोनों अधिकारियों के तबादले की घोषणा के बाद ही ख़त्म की.
इमेज स्रोत, Getty Images
आम तौर पर दिल्ली पुलिस के कर्मी अपने वरिष्ठ अधिकारियों के ख़िलाफ़ अनुशासनात्मक कार्रवाई, वेतन, तबादलों या कामकाज़ की परिस्थितियों को लेकर उसी तरह सार्वजनिक प्रदर्शन नहीं कर सकते, जिस तरह आम नागरिक कर सकते हैं.
वे निर्धारित शिकायत निवारण प्रक्रियाओं और क़ानूनी माध्यमों से फ़ैसलों को चुनौती दे सकते हैं, लेकिन सार्वजनिक प्रदर्शन आयोजित करने का उनका अधिकार एक विशेष क़ानून और नियमों के तहत सीमित है.
कौन-सा कानून लागू होता है?
इससे संबंधित प्रमुख क़ानून पुलिस-फ़ोर्स (रिसिट्रिक्शन ऑफ राइट्स) एक्ट, 1966 है. इंडिया कोड के मुताबिक़, यह क़ानून तीन दिसंबर 1966 को दिल्ली में लागू हुआ था. इसका मक़सद पुलिसकर्मियों के कुछ मौलिक अधिकारों पर प्रतिबंध लगाना है, ताकि अनुशासन बना रहे और वे अपने कर्तव्यों का उचित तरीक़े से निर्वहन कर सकें.
हालांकि, इसमें एक सीमित अपवाद है. किसी अधिकृत संगठन की ओर से बुलाई गई बैठक, जिसका मक़सद उस संगठन के स्वीकृत लक्ष्यों को आगे बढ़ाना हो और जो सेवा शर्तों से जुड़े मुद्दों पर आयोजित की गई हो, इस अपवाद के दायरे में आ सकती है. लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि सड़क पर प्रदर्शन करने की सामान्य अनुमति मिल गई है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
BBC World Service के नए ऐप को डाउनलोड करें
BBC News हिन्दी को चुनें और पाइए न्यूज़ अलर्ट, लाइव टीवी, पॉडकास्ट... सब एक जगह
कृपया नोट करें: नया ऐप ब्रिटेन और अमेरिका में उपलब्ध नहीं है.
प्लेबैक आपके उपकरण पर नहीं हो पा रहा
शॉर्ट वीडियो का अंत
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित
© 2026 BBC. बाहरी साइटों की सामग्री के लिए बीबीसी ज़िम्मेदार नहीं है. बाहरी साइटों का लिंक देने की हमारी नीति के बारे में पढ़ें.
Comments ()
Be the first to share your perspective on this story!