कार्तिक अमावस्या की रात को दीप जलाकर प्रकाश फैलाने और लक्ष्मी की पूजा करने की परंपरा सदियों पुरानी है। यह प्रथा घर की साफ‑सफाई, धनतेरस पर खरीदारी और दीपों के साथ घर को रोशन करने से शुरू होती है।
परंपरा के पीछे सवाल उठता है – लक्ष्मी पूजा का इतिहास क्या है? दीपावली पर उनकी पूजा कैसे बनी? यदि दीपावली श्रीराम की अयोध्या वापसी का पर्व है, तो इसमें लक्ष्मी की भूमिका क्यों है?
इन प्रश्नों के उत्तर दो रास्तों से मिलते हैं: पौराणिक कथाएँ और ऐतिहासिक शोध।
वेदों में ‘श्री’ शब्द का उल्लेख मिलता है, जिसे तेज, सौंदर्य, प्रतिष्ठा और ऐश्वर्य के रूप में समझा गया। ऋग्वेद के ‘श्रीसूक्त’ में लक्ष्मी को सोने‑चांदी की आभा वाली देवी के रूप में वर्णित किया गया है, जो पशुधन, अन्न, कीर्ति और जीवन की समृद्धि की कामना पूरी करती हैं। इस प्रकार ‘श्री’ और लक्ष्मी एक ही अर्थ में प्रयोग होने लगे।
समुद्र मंथन की कथा में भी लक्ष्मी का उल्लेख है। विष्णु पुराण के अनुसार, क्षीरसागर के मंथन से ‘श्रीदेवी’ प्रकट हुईं और उन्होंने विष्णु को धन की देवी के रूप में स्वीकार किया। इससे लक्ष्मी को धन की देवी के रूप में स्थापित किया गया।
पुरातात्त्विक प्रमाण 2वीं शताब्दी ईसा पूर्व के हैं, जब मौर्य काल में ‘देवी श्री’ की पूजा के संकेत मिले। शुंगकाल में पत्थर पर देवी-देवताओं के चित्र उकेरे गए, जिनमें कमल पर खड़ी स्त्री आकृतियाँ भी थीं।
शुंगकालीन स्तूपों में ‘सिरिमा’ के रूप में ‘श्री’ से जुड़ी देवी की मूर्ति पाई गई, जिसे बाद में ‘गजलक्ष्मी’ के नाम से जाना गया। यह दर्शाता है कि प्राचीन भारत में ‘श्री’ को समृद्धि और सौभाग्य की देवी के रूप में माना जाता था।
गुप्तकाल में, 4वीं से 6वीं शताब्दी ईस्वी के दौरान, स्वर्ण मुद्राओं पर लक्ष्मी या श्री की प्रतिमा दिखाई देती है, जो राजकीय वैभव और सत्ता से जुड़ी होती है।
लक्ष्मी के स्वरूप में कमल का विशेष स्थान है। कमल पर विराजमान और हाथों में कमल धारण करते हुए उनकी मूर्तियाँ पाई जाती हैं, जो पवित्रता और समृद्धि का प्रतीक हैं।
प्राचीन संस्कृत साहित्य में भी दीपावली के संकेत मिलते हैं। पंडित पी. के. गोडे के शोध और पी. वी. काणे की पुस्तक में दीपावली की प्राचीन परंपराएँ वर्णित हैं।
वात्स्यायन के कामसूत्र में ‘यक्षरात्रि’ का उल्लेख है, जिसे कुछ विद्वान दीपावली की आरम्भिक परंपराओं से जोड़ते हैं। 12वीं शताब्दी के हेमचंद्र की ‘देशीनाममाला’ में भी इसी संबंध का संकेत मिलता है।
कश्मीर के ‘नीलमतपुराण’ और 7वीं शताब्दी के सम्राट हर्षवर्धन के संस्कृत नाटक ‘नागानंद’ में भी दीपोत्सव का वर्णन मिलता है, जो प्राचीन भारत में दीप जलाने की परंपरा को दर्शाता है।
इस प्रकार दीपावली एक ही पौराणिक कथा से नहीं, बल्कि विभिन्न धार्मिक और लोक परंपराओं के संयोग से विकसित हुआ उत्सव है। समय के साथ भगवान राम की अयोध्या वापसी, लक्ष्मी पूजा और सुख‑समृद्धि की कामना जैसी मान्यताएँ जुड़ती गईं।
लक्ष्मी पूजा और दीपावली का संबंध गहराई से जुड़ा है। व्यापारिक समुदायों में बहीखातों का पूजन और आर्थिक वर्ष की शुरुआत की परंपराएँ इस पर्व को खास बनाती हैं।
दीपावली पर लक्ष्मी के साथ गणेश की पूजा भी प्रचलित है। लक्ष्मी समृद्धि का प्रतीक और गणेश बुद्धि व विघ्न निवारण के देवता हैं, जिससे धन के साथ विवेक की आवश्यकता पर बल दिया जाता है।
भारत के विभिन्न हिस्सों में लक्ष्मी पूजा के अलग‑अलग रूप हैं। बंगाल में कोजागरी पूजा, महाराष्ट्र में दीपावली पर लक्ष्मी पूजन, दक्षिण भारत में वरलक्ष्मी व्रत – सभी में लक्ष्मी को शुभता और समृद्धि का स्रोत माना जाता है।
बंगाल में शरद पूर्णिमा को ‘कोजागरी’ पूजा कहा जाता है, जहाँ भक्त रातभर जागरण कर देवी की पूजा करते हैं। यह परंपरा दर्शाती है कि लक्ष्मी पूजा केवल धन की नहीं, बल्कि समग्र जीवन‑शैली की समृद्धि से जुड़ी है।
लक्ष्मी का व्यापक सांस्कृतिक अर्थ अन्न, पशुधन, जल, उर्वरता और राजसत्ता से जुड़ा है। वैदिक ग्रंथों से लेकर पुराणों और आधुनिक कलाओं तक, लक्ष्मी का स्वरूप लगातार विकसित होता रहा है।
अंततः दीपावली के दीपों की रोशनी में लक्ष्मी घर‑घर की आराध्य बन गई, जिससे कार्तिक अमावस्या की रात केवल धन की कामना नहीं, बल्कि सांस्कृतिक परंपरा का उत्सव बन गई।
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