पीयूष गोयल ने मंगलवार को आयोजित प्रेस कॉन्फ़्रेंस में कांग्रेस पर आरोप लगाते हुए कहा कि पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्तों को राजनीतिक पद और सम्मान देकर पार्टी को लाभ पहुँचाया गया है। उन्होंने टीएन शेषन, एमएस गिल, आरके त्रिवेदी और नवीन चावला के नाम लेकर सवाल उठाए।
टीएन शेषन, भारत के दसवें मुख्य चुनाव आयुक्त, 12 दिसंबर 1990 से 11 दिसंबर 1996 तक इस पद पर रहे। उनके कार्यकाल में चुनावी आचार संहिता के कड़ाई से पालन की मिसालें बनीं। पद छोड़ने के बाद उन्होंने 1997 में राष्ट्रपति चुनाव में भाग लिया, फिर 1999 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के टिकट पर गुजरात की गांधीनगर सीट से चुनाव लड़ा, पर हार गए।
एमएस गिल, 12 दिसंबर 1996 से 13 जून 2001 तक मुख्य चुनाव आयुक्त रहे। उनके कार्यकाल में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EV) के प्रयोग को बढ़ावा मिला। पद छोड़ने के बाद वे अप्रैल 2004 में पंजाब से कांग्रेस के राज्यसभा सदस्य बने, और 2008 में युवा मामलों और खेल मंत्रालय के मंत्री नियुक्त हुए। 2010 में फिर से राज्यसभा पहुंचे।
आरके त्रिवेदी, 18 जून 1982 से 31 दिसंबर 1985 तक मुख्य चुनाव आयुक्त रहे। पद छोड़ने के तुरंत बाद 26 फ़रवरी 1986 को उन्हें गुजरात का राज्यपाल बनाया गया, जिससे दो महीने के भीतर ही राजनैतिक पद पर पहुँचने का सवाल उठता है।
वी.एस. रमादेवी, 26 नवंबर 1990 से 11 दिसंबर 1990 तक केवल 15 दिनों के लिए मुख्य चुनाव आयुक्त रही। लगभग सात वर्ष बाद 26 जुलाई 1997 को वे हिमाचल प्रदेश की राज्यपाल बनीं, और बाद में कर्नाटक की राज्यपाल भी बनीं।
नवीन चावला, 21 अप्रैल 2009 से 29 जुलाई 2010 तक मुख्य चुनाव आयुक्त रहे। 2009 में तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त एन गोपालस्वामी ने राष्ट्रपति को पत्र लिखकर चावला को पद से हटाने की सिफ़ारिश की, पर वह पद पर ही रहे।
2009 में गोपालस्वामी ने राष्ट्रपति को एक पत्र लिखा, जिसमें उन्होंने कहा कि पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्तों और चुनाव आयुक्तों को पद छोड़ने के बाद सरकारी नियुक्तियों से रोका जाना चाहिए। उन्होंने राज्यपाल या उपराज्यपाल जैसे पदों पर नियुक्ति न करने और कम से कम दस वर्षों तक किसी राजनीतिक दल में शामिल न होने की सिफ़ारिश की।
साल 2023 में संसद ने मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति, सेवा शर्तों और कार्यकाल पर नया कानून पारित किया। इस कानून के तहत तीन-सदस्यीय चयन समिति बनती है, जिसमें प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और प्रधानमंत्री की ओर से नामित एक केंद्रीय मंत्री शामिल होते हैं; भारत के मुख्य न्यायाधीश को इसमें शामिल नहीं किया गया है।
19 फ़रवरी 2025 को ग्यानेश कुमार को भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त के रूप में नियुक्त किया गया। 2023 के नए कानून के तहत उनकी नियुक्ति हुई। उनके कार्यकाल में मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (सार्वजनिक सूचना विनिर्देश - SIRe) के कारण बड़े पैमाने पर विवाद उभरे। विपक्ष ने दावा किया कि सूचियों में गड़बड़ियों से कई मतदाताओं के वोटाधिकार प्रभावित हुए हैं।
मार्च 2026 में विपक्षी सांसदों ने ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने के लिए संसद के दोनों सदनों में नोटिस दिए, जिन पर 130 लोकसभा और 63 राज्यसभा सांसदों ने हस्ताक्षर किए। अप्रैल में दोनों सदनों के पीठासीन अधिकारियों ने नोटिस स्वीकार नहीं किया।
सितंबर 2026 में एक जांच रिपोर्ट में चुनाव आयोग के भीतर निर्णय लेने की प्रक्रियाओं में मतभेदों की बात सामने आई। चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने कुछ निर्णयों पर लिखित आपत्तियां दर्ज कीं, पर आयोग ने कहा कि यह सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा है।
अक्टूबर 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और चुनाव आयोग से जवाब मांगा, जिसमें आरोप था कि ज्ञानेश कुमार ने कुछ निर्णय एकतरफ़ा लिए। सुप्रीम कोर्ट ने नोटिस जारी किया, पर यह आरोपों को सही ठहराने के लिए नहीं बल्कि संबंधित पक्षों से स्पष्टीकरण मांगने के लिए था।
12 अक्टूबर को विपक्षी नेताओं और समर्थकों ने सुप्रीम कोर्ट की ओर मार्च किया, मतदाता सूचियों में संशोधन को चुनौती देते हुए याचिका दायर की। विपक्ष का कहना है कि सूचियों में बदलाव से बड़ी संख्या में पात्र मतदाता प्रभावित हो रहे हैं।
बीजेपी ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि विपक्ष संवैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता को नुकसान पहुँचाने का प्रयास कर रहा है।
इस राजनीतिक टकराव के बीच 13 अक्टूबर को पीयूष गोयल ने कांग्रेस के पुराने रिकॉर्ड पर सवाल उठाया, जिससे पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्तों के राजनीतिक भागीदारी पर नया विमर्श शुरू हुआ।
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