14 अक्टूबर को मेरठ डिस्ट्रिक्ट कोर्ट में जिला जज अरविंद कुमार मिश्रा ने सुबह 10:10 बजे सत्र शुरू किया। सरकारी वकील और बचाव पक्ष की टीम पहले से मौजूद थी, और प्रक्रिया टीवी स्क्रीन पर लाइव दिख रही थी। जेल के वीसी रूम में मुस्कान और साहिल कैमरे के सामने बैठे थे, जबकि कोर्टरूम में केवल जज और एक स्टाफ सदस्य उन्हें देख पा रहे थे।
जज ने सबसे पहले मुस्कान से सवाल शुरू किए: “आज मैं आपको सज़ा सुनाने वाला हूँ, क्या आपको पता है?” मुस्कान ने सिर हिलाकर सहमति जताई, फिर जज ने पूछा कि क्या वह कुछ कहना चाहता है, पर वह चुप रही। सज़ा के बारे में उसकी राय पूछने पर भी वह मौन रही।
फिर जज ने साहिल की बारी ली। उन्होंने पूछा कि क्या उसे कोई बीमारी है, वह नकारता है। परिवार के बारे में पूछते ही साहिल ने बताया कि उसकी नानी अभी भी जीवित है। शिक्षा के बारे में पूछने पर वह कहता है कि वह ग्रेजुएट है और अभी भी चार्टर्ड अकाउंटेंट (CA) बनना चाहता है। इन जवाबों के बाद जज ने दोनों को अस्थायी रूप से रिहा कर दिया, कहा “सज़ा सुनाने से पहले फिर मिलेंगे” और वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग समाप्त हुई।
बचाव पक्ष के वकीलों ने तुरंत कम उम्र, पहला अपराध और जेल में अच्छा व्यवहार को ध्यान में रखकर मृत्युदंड की बजाय उम्रकैद की मांग की। उन्होंने कहा कि मुस्कान ने अधिकांश समय पूजा‑पाठ किया और पिछले डेढ़ साल में उसका व्यवहार सुधार गया है। सुप्रीम कोर्ट के कई फ़ैसलों का हवाला देते हुए उन्होंने न्यायालय से दया की गुज़ारिश की।
सरकारी वकील ने इस पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि सौरभ की हत्या की योजना‑बद्ध और क्रूर प्रकृति को नहीं भूला जा सकता। लाश के टुकड़े करने, उन्हें नीले ड्रम में रखने जैसी कारवाइयाँ पूर्व नियोजित थीं, इसलिए उम्र या पहले अपराध को आधार बनाकर सज़ा घटाना न्यायसंगत नहीं है। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि जेल में अच्छा व्यवहार या धार्मिक गतिविधियों से दया नहीं मिलनी चाहिए; समाज और जनता की भावना भी ध्यान में रखनी होगी। अंत में उन्होंने मृत्युदंड की मांग दोहराई।
दो घंटे पाँच मिनट के बहस के बाद, दोपहर 12:15 बजे जज ने कुर्सी से उठकर अपने चैंबर में चले गए। उसी दिन कोर्ट हड़ताल के कारण अधिकांश सुनवाई बंद थी; केवल दो मामलों—एक केस का फैसला और ज़मानत के मुद्दे—को ही अनुमति थी। इसलिए बहस के बाद कोर्टरूम खाली हो गया।
दोपहर 4:10 बजे जज ने फिर से कोर्टरूम में प्रवेश किया। इस बार मुस्कान और साहिल फिर से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए जुड़े हुए थे, और कोर्टरूम में उपस्थित सभी लोग उनका इंतजार कर रहे थे।
जज ने मुस्कान और साहिल के वकीलों को आश्वस्त किया, “आप परेशान क्यों दिख रहे हैं, घबराने की कोई बात नहीं।” फिर उन्होंने महाभारत का एक श्लोक पढ़ा और कहा, “दंड ही धर्म है।” अंत में उन्होंने एक ही पंक्ति में कहा, “आप दोनों को आपके किए अपराध के लिए मृत्युदंड दिया जाता है।” यह घोषणा होते ही कोर्टरूम में “भारत माता की जय” के नारे गूँजने लगे। जज ने तुरंत निर्णय पर हस्ताक्षर किए; यह कार्य बॉल पेन से किया गया, जिससे निब टूटने की जरूरत नहीं पड़ी। निर्णय पर हस्ताक्षर होते ही घड़ी में शाम 4:16 बजे दिखा।
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