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स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (एसआईआर) को लेकर उठ रहे सवालों के बीच निर्वाचन आयोग की ओर से यह तर्क दिया जाता रहा है कि मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण की ऐसी प्रक्रिया पहले भी अपनाई जा चुकी है.
भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के नेता भी कई मौक़ों पर कह चुके हैं कि एसआईआर जैसी प्रक्रिया कांग्रेस के शासनकाल में भी होती रही है.
हालांकि, 2003 में हुए पुनरीक्षण और 2025 में चल रही एसआईआर प्रक्रिया के बीच कई अंतर हैं.
एसोसिएशन फ़ॉर डेमोक्रेटिक रिफ़ॉर्म्स (एडीआर) ने बिहार में एसआईआर को चुनौती देने वाली याचिका की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के सामने इन दोनों प्रक्रियाओं के बीच अंतर का मुद्दा उठाया था.
एडीआर उन याचिकाकर्ताओं में शामिल है, जिन्होंने बिहार में एसआईआर को चुनौती दी है.
संगठन ने अदालत में कहा कि निर्वाचन आयोग भले ही 2025 के एसआईआर को 2003 में हुए पुनरीक्षण पर आधारित बता रहा हो, लेकिन दोनों प्रक्रियाओं की गाइडलाइंस में काफ़ी अंतर हैं.
एडीआर के मुताबिक़, 2003 की प्रक्रिया को 2025 के एसआईआर के लिए मिसाल के तौर पर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता.
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एडीआर का कहना है कि 2003 की गाइडलाइंस से पता चलता है कि पूरी इंटेंसिव रिवीजन प्रक्रिया छह महीने से अधिक चली थी.
तब मतदाता सूची के एकीकरण की प्रक्रिया जून 2002 के अंत तक पूरी होनी थी, प्राइमरी वोटर लिस्ट की छपाई जुलाई में और घर-घर सत्यापन जुलाई से अगस्त तक चलना था.
इसके बाद ड्राफ़्ट रोल तैयार करने के लिए क़रीब दो महीने दिए गए और अंतिम मतदाता सूची के प्रकाशन की पुष्टि 6 जनवरी 2003 को हुई.
इसके विपरीत, 2025 का एसआईआर महज तीन महीने में पूरा किया गया. 24 जून को इसकी घोषणा हुई, 25 जून से 26 जुलाई तक एन्यूमरेशन फ़ॉर्म जमा किए गए, 1 अगस्त को ड्राफ़्ट रोल प्रकाशित हुआ, 1 सितंबर तक आपत्तियां ली गईं और 30 सितंबर को फ़ाइनल रोल प्रकाशित कर दिया गया.
2025 का एसआईआर 30 सितंबर को पूरा हुआ, जबकि बिहार विधानसभा चुनाव 6 और 11 नवंबर को दो चरणों में होने थे.
इस तरह, उपलब्ध गाइडलाइंस और समय सीमा की तुलना से 2003 और 2025 की प्रक्रियाओं में स्पष्ट अंतर दिखाई देता है.
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एडीआर के मुताबिक़, 2003 के पुनरीक्षण में मतदाता सूची में नाम शामिल करने और मतदाताओं के डेटा को अपडेट करने की मुख्य जिम्मेदारी एन्यूमरेटर (जो डेटा इकट्ठा करते हैं) की थी.
संगठन का कहना है कि 2025 के एसआईआर में यह जिम्मेदारी काफ़ी हद तक मतदाताओं पर डाल दी गई है. उन्हें खुद एन्यूमरेशन फ़ॉर्म भरकर जमा करना है और फ़ॉर्म जमा नहीं करने की स्थिति में उनका नाम मतदाता सूची में शामिल नहीं हो सकता.
सामाजिक और राजनीतिक कार्यकर्ता योगेंद्र यादव भी मानते हैं 2003 की प्रक्रिया अब से काफ़ी अलग थी.
वो कहते हैं, "चुनाव आयोग का पहला झूठ यह है कि 2003 में सभी मतदाताओं ने गणना पत्र या एन्यूमरेशन फ़ॉर्म भरे थे. लेकिन 2003 की गाइडलाइन कुछ और ही कहानी बताती है. 2003 में किसी भी मतदाता से कोई एन्यूमरेशन फ़ॉर्म नहीं भरवाया गया था. उन दिनों चुनाव आयोग के स्थानीय प्रतिनिधि के बतौर बीएलओ की जगह एन्यूमरेटर हुआ करता था. उसे निर्देश था कि वे घर-घर जाकर पुरानी मतदाता सूची में संशोधन करें."
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योगेंद्र यादव का कहना है कि तब संशोधित सूची को नए सिरे से लिखा जाता था और उस पर परिवार के मुखिया के हस्ताक्षर करवाए जाते थे.
उनका कहना है, "सामान्य वोटर के लिए ना कोई फ़ॉर्म था, ना कोई समय सीमा और ना ही फ़ॉर्म ना भरने पर लिस्ट से अपने आप नाम कट जाने का डर."
2003 की गाइडलाइंस के पैरा 12 का हवाला देते हुए एडीआर ने कहा कि उस समय एन्यूमरेटर को घर-घर जाकर मतदाताओं के डेटा को अपडेट करना था. वहीं, पैरा 15 के तहत एन्यूमरेटर को घरों की सूची, संबंधित क्षेत्र का नक्शा और प्राइमरी वोटर लिस्ट उपलब्ध कराई गई थी.
उनके काम की निगरानी के लिए पर्यवेक्षकों की जिम्मेदारी तय की गई थी. उन्हें कम से कम 25 फ़ीसदी काम की रैंडम जांच भी करनी थी.
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योगेंद्र यादव का कहना है कि पुरानी गाइडलाइन में साफ़ तौर पर लिखा था कि एन्यूमरेटर का काम किसी व्यक्ति की नागरिकता की जांच करना नहीं है.
उन्होंने बताया कि उस समय नागरिकता का प्रमाण सिर्फ़ दो स्थितियों में मांगा जा सकता था. पहली स्थिति
तब थी, जब किसी इलाके को राज्य सरकार ने 'विदेशी बाहुल्य क्षेत्र' घोषित किया हो. ऐसे इलाके में अगर कोई नया व्यक्ति वोटर आई-कार्ड बनवाने आता था और उसके परिवार के किसी सदस्य का पहले से वोटिंग का अधिकार नहीं था, तभी उसकी नागरिकता की जांच की जा सकती थी.
दूसरी स्थिति तब थी, जब किसी व्यक्ति के खिलाफ़ लिखित शिकायत की जाती कि वह भारत का नागरिक नहीं है.
ऐसी स्थिति में शिकायत करने वाले व्यक्ति को यह साबित करना होता था कि संबंधित व्यक्ति विदेशी है.
योगेंद्र यादव के मुताबिक, इन दो स्थितियों के अलावा किसी व्यक्ति की नागरिकता की जांच नहीं की जाती थी और सिर्फ नागरिकता के आधार पर उसका नाम मतदाता सूची से नहीं हटाया जा सकता था.
उन्होंने यह भी कहा कि पुरानी गाइडलाइन में पहले से मतदाता सूची में दर्ज नाम को महत्व देने की बात कही गई थी.
यादव का आरोप है कि इस बार निर्वाचन आयोग ने विदेशी नागरिकों की पहचान करने की ज़िम्मेदारी खुद अपने हाथ में ले ली है.
उनके मुताबिक़, पिछली प्रक्रिया में यह जिम्मेदारी सरकार की थी, निर्वाचन आयोग की नहीं.
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'वोट फ़ॉर डेमोक्रेसी' और 'सिटिजन्स फ़ॉर जस्टिस एंड पीस' की ओर से जारी एक बुकलेट में भी 2003 और 2025-26 की एसआईआर प्रक्रिया के बीच अंतर बताया गया है.
बुकलेट के मुताबिक़, 2003 के दिशा-निर्देशों में मौजूदा मतदाता सूची को आधार बनाकर घर-घर जाकर सत्यापन करने का प्रावधान था.
उस समय की मतदाता सूची और इलेक्ट्रॉनिक इलेक्टोरल फ़ोटो आइडेंटिटी कार्ड (ईपीआई) को भी प्रक्रिया का आधार बनाया गया था.
बुकलेट में कहा गया है, "उस समय वोटर कार्ड का ईपीआईसी नंबर और वोटर आईडी कार्ड दोनों को मान्य दस्तावेज के तौर पर स्वीकार किया गया था. लेकिन अब ऐसा नहीं है."
बुकलेट के मुताबिक़, तब जिन लोगों के वोटर लिस्ट से नाम कटे, उन्हें यह घोषणा करने के लिए नहीं कहा गया कि वे कभी मतदाता नहीं रहे हैं.
इसके अलावा, 2003 में एसआईआर शुरू होने से पहले संबंधित क्षेत्र में घरों की सूची तैयार करने और उनका नक्शा बनाने का काम भी किया गया था.
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वोट फ़ॉर डेमोक्रेसी और सिटिजन्स फ़ॉर जस्टिस एंड पीस के मुताबिक़, 2025-26 की प्रक्रिया में निर्वाचन आयोग ने वोटर आईडी कार्ड को उन 11 दस्तावेजों की सूची में शामिल नहीं किया, जिनके जरिए मतदाता अपनी पात्रता साबित कर सकते थे.
संगठन का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के सामने भी वोटर आईडी कार्ड को इस सूची में शामिल किए जाने का विरोध किया गया.
एडीआर ने 2003 में नागरिकता साबित करने के लिए बताए गए चार दस्तावेजों का भी उल्लेख किया है.
इनमें राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी), सक्षम प्राधिकारी की ओर से जारी नागरिकता प्रमाणपत्र, भारत सरकार की ओर से जारी वैध पासपोर्ट और जन्म प्रमाणपत्र शामिल थे.
योगेंद्र यादव कहते हैं कि 2003 में सबसे दस्तावेज मांगा ही नहीं गया था, बल्कि कुछ लोगों से मांगा गया था.
उन्होंने कहा, "दस्तावेज केवल उन लोगों से मांगे गए थे जो किसी दूसरे प्रदेश से आकर पहली बार अपने पूरे परिवार का वोट बनवा रहे थे. या उनसे जिनके बारे में शक था कि वो अपनी आयु ठीक नहीं बता रहे हैं या अपना सामान्य निवास गलत बता रहे हैं. यानी कि पिछली बार कुछ एक अपवाद को छोड़कर किसी से कोई दस्तावेज मांगा ही नहीं गया था."
इसके उलट, इस बार हो रहे एसआईआर में हर व्यक्ति को अपनी पात्रता साबित करने के लिए कोई न कोई दस्तावेज देने की बात सामने आई.
इसके लिए या तो 2003 की मतदाता सूची में अपना नाम होने का प्रमाण देना था या फिर 11 में से किसी एक दस्तावेज को जमा करना था.
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एडीआर ने सुप्रीम कोर्ट में दलील रखते हुए यह भी कहा था कि 2003 के गाइडलाइंस के तहत दावों और आपत्तियों का निपटारा किए जाने के बाद ही अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित की जानी थी.
इसके अलावा, किसी मतदाता का नाम हटाने से पहले निर्धारित प्रक्रिया का पालन करना और संबंधित व्यक्ति को सुनवाई का अवसर देना ज़रूरी था.
एडीआर का कहना है कि अब की प्रक्रिया में कई मतदाताओं को सुनवाई का उचित अवसर नहीं मिला.
संगठन का दावा है कि कई मतदाता नोटिस जारी होने और आदेश पारित किए जाने से भी अनजान रहे.
योगेंद्र यादव कहते हैं कि चुनाव आयोग का यह दावा झूठा है कि कि वह एसआईआर में 2003 की गहन पुनरीक्षण की प्रक्रिया को दोहरा रहा है.
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