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बच्चों को खांसी-जुकाम होना आम बात है। खासकर मौसम बदलने पर इस तरह की समस्याएं और बढ़ जाती हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, बच्चों की रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होती है, जिसके कारण उनके संक्रामक रोग की चपेट में आने का जोखिम अधिक देखा जाता रहा है। हालांकि हर बार होने वाली ये दिक्कतें, सिर्फ वायरल संक्रमण की वजह से हों ऐसा जरूरी नहीं है। कुछ स्थितियों में लंबे समय तक बनी रहने वाली खांसी-जुकाम की दिक्कतें अन्य गंभीर बीमारियों की तरफ संकेत हो सकती हैं, जिनको लेकर डॉक्टर सभी माता-पिता को अलर्ट कर रहे हैं।
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डाइलेटेड कार्डियोमायोपैथी की समस्या के बारे में जानिए डाइलेटेड कार्डियोमायोपैथी (डीसीएम) दिल की मांसपेशियों की एक ऐसी बीमारी है जो दुनियाभर में लगभग हर 250 में से 1 व्यक्ति को प्रभावित करती है। यह दिल की कमजोरी यानी हार्ट फेलियर का बड़ा कारण है। हालांकि यह बीमारी बच्चों की तुलना में वयस्कों में ज्यादा देखने को मिलती है। लेकिन एक साल से कम उम्र के बच्चों में इसका खतरा अधिक हो सकता है। विशेषज्ञ अभी तक यह पूरी तरह नहीं समझ पाए हैं कि बच्चों में यह बीमारी क्यों होती है। हालांकि कुछ अध्ययनों से पता चला है कि कुछ आनुवंशिक बदलाव यानी माता-पिता से मिलने वाले जीन में बदलाव और कुछ वायरल संक्रमण जैसी स्थितियां इसके खतरे को बढ़ाने वाली हो सकती है। मां कोर्टनी कहती हैं, शुरुआत में हमें बताया गया था कि ये बच्चों में होने वाला सामान्य संक्रमण है। लेकिन उसकी खांसी ठीक नहीं हो रही थी। धीरे-धीरे हालत इतनी बिगड़ गई कि उसे खांसी के साथ उल्टियां भी होने लगीं। हमें अस्पताल में डॉक्टर के पास जाने के लिए सीढ़ियां चढ़नी पड़ती थीं। वह सीढ़ियां चढ़ने के बाद कम से कम पांच मिनट तक बहुत ज्यादा हांफती रहती थी।" डॉक्टर ने भी कहा भी था कि तीन साल की बच्ची का इतनी ज्यादा सांस फूलना सामान्य नहीं है।
कुछ ही हफ्तों में पेनी की हालत पूरी तरह बदल गई। जो बच्ची कुछ समय पहले तक बहुत खुश रहती थी और इधर-उधर दौड़ती रहती थी, वह अब बेहद सुस्त रहने लगी और खाना तक खाने से मना करने लगी। जून के आखिर में स्कूल की खेल प्रतियोगिता के दौरान पेनी को अचानक दौरा पड़ा। जांच में डॉक्टरों ने पाया कि उसका दिल सामान्य तरीके से धड़क ही नहीं रहा था और शरीर के अलग-अलग हिस्सों तक पर्याप्त खून नहीं पहुंचा पा रहा था। हालत की गंभीरता को देखते हुए उसे एडवांस लाइफ सपोर्ट मशीन पर रखा गया। यह ऐसी मशीन होती है जो शरीर के जरूरी कामकाज को सहारा देती है, जब शरीर खुद उन्हें ठीक से नहीं कर पाता। डॉक्टरों ने उसके दिल की धड़कन को सामान्य करने के लिए ऑपरेशन किया। शुरुआत में ऐसा लगा कि सर्जरी का असर अच्छा हुआ है। हम सभी बहुत खुश थे क्योंकि ऑपरेशन के बाद जब वह बाहर आई तो उसकी दिल की धड़कन स्थिर थी। मुझे लगा कि हमारी बेटी अब घर वापस आएगी। हालांकि ईश्वर को कुछ और ही मंजूर था। आगे की रिपोर्ट्स में डॉक्टरों ने जो बताया उससे मेरा दिल बैठ गया, क्योंकि मैं जानती थी कि दिल को तो ठीक किया जा सकता है, लेकिन दिमाग को ठीक नहीं किया जा सकता। इस बीमारी से पीड़ित कुछ मरीज हार्ट ट्रांसप्लांट की मदद से ठीक हो सकते हैं। लेकिन पेनी की हालत बहुत जटिल हो चुकी थी, इसलिए वह इस इलाज के लिए उपयुक्त नहीं थी। हमें यह भी बताया गया था कि अगर पेनी को नया दिल मिल भी जाता, तब भी उसके बचने की संभावना नहीं थी। आखिरकार परिवार के सामने जीवन रक्षक मशीन बंद करने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं बचा। इस पूरी घटना को याद करते हुए कोर्टनी कहती हैं, मुझे अफसोस है कि जब उनकी बेटी पहली बार बीमार हुई थी, तब हमने तुरंत आगे की जांच के लिए ज्यादा जोर नहीं दिया। मैं माता-पिता को डराना नहीं चाहती, लेकिन बस इतना सलाह देना चाहती हूं कि अगर आपके बच्चे में कोई समस्या लंबे समय तक बनी रहे तो बिना देर किए डॉक्टर की सलाह लें। समय पर जांच और इलाज शायद पेनी जैसी घटनाओं को रोकने में मदद कर सकती है।
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